संयुक्त परिवार

संयुक्त परिवार

संयुक्त परिवार

टूटते परिवार, अकेले बुज़ुर्ग – यह समाज की हार है

जहाँ जड़ें मिटें, वहाँ पीढ़ियाँ बिखर जाती हैं – समय है फिर से जड़ों से जुड़ने का!”

संयुक्त परिवार खत्री समाज की असली पूँजी रहे हैं—जहाँ बुजुर्गों का अनुभव, युवाओं की ऊर्जा और बच्चों की मुस्कान एक साथ बसर करते थे। लेकिन अब इस पूँजी में दरार आ रही है। आधुनिकता के नाम पर एकल परिवारों का चलन बढ़ा है, जिससे न सिर्फ बुजुर्ग अकेले और उपेक्षित हो गए हैं, बल्कि युवा भी जीवन की चुनौतियों से अकेले जूझने लगे हैं। आज एक अकेला परिवार न समाज में आवाज़ रख पाता है, न संघर्षों में सहारा पाता है। गली-मोहल्लों में जिनका संयुक्त परिवार है, वही आज भी प्रभावी हैं, उनका दबदबा  है, उनकी पहुंच  है। हमें इस दरार को मिटाकर संवाद की पुलिया बनानी होगी।
अब हमें “परिवार संवाद सप्ताहजैसे अभियान चलाने होंगे — जहां घर-घर में एक शाम सिर्फ बुजुर्गों के साथ बिताई जाए। लोहरी, रक्षा बंधन जैसे त्यौहारों को एक परिवार नहीं, पूरे मोहल्ले के खत्री समाज के साथ मनाना होगा।

बुजुर्ग प्रेरणा मंडलजैसे मंच बनाकर उनके अनुभवों को रिकॉर्ड किया जाए, उन्हें स्कूलों में बच्चों से मिलवाया जाए ताकि भावी पीढ़ी को संस्कारों का सजीव पाठ मिल सके। इस दिशा में पंजाब केसरी सामचार पत्र ने सराहनीय कार्य किया है, उन्होंने वरिष्ठ नागरिक केसरी क्लब गठित किया है, इसका अनुसरण किया जाना चाहिए

संयुक्त परिवार में आत्मिक शक्ति, सामाजिक सुरक्षा, और आर्थिक समझदारी होती है। जो अकेले रहते हैं, वे अक्सर दबाव में होते हैं  इसके विपरीत संयुक्त परिवारों में ये सभी जिम्मेदारियां बाँट ली जाती हैं, इसलिए खत्री समाज को मूल की तरफ लौटना होगा यही हमारे समाज की ताकत है हमारा कर्तव्य है, संकल्प है, और अगली पीढ़ी को देने वाली सबसे बड़ी विरासत है।

लिखित द्वारा: खत्रीनामा टीम